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क्रिकेट की हार और नानी की जादू की झप्पी

क्रिकेट की हार और नानी की जादू की झप्पी

Jadoo Ki Jhappi: मानव जीवन में न जाने कितने ऐसे पल आते हैं जब मानव शरण ढूंढता है। खासकर थका हारा और निराश बालक दादी-नानी की शरण में जाता है।वह गले लगाकर जो झप्पी देती है उसे ही "जादू की झप्पी "कहते हैं।

आज मैं अपनी नानी की जादू की झप्पी की याद ताजा कर रहा हूं।मेरी नानी गांव में रहती थी और उस समय की बात है जब मैं बाल कवि और क्रिकेट खिलाड़ी था।स्वयं की तुलना गावस्कर और बेंगसरकर से किया करता था। लंबी-चौड़ी फेंकता भी था।

सो उस समय नानी पटना मेरे घर पर आयी थीं और दो दिन बाद उन्हें डाल्टेनगंज मामा के पास जाना था। अनायास ही मेरे जीवन का पहला मैच देखने -नानी, मां, बाबूजी, ताऊजी, ताई सभी गये थे।मगर यह क्या? मैं तो पहली ही बाल पर शून्य पर आउट हो गया।

फिर निराश, हताश वापस आया।हालांकि बॉलिंग में तीन विकेट चटकाए और दो असंभव कैच पकड़ा।सब कुछ सही मगर शून्य पर आउट होना दिल तोड़ दिया।घर आकर मैं बुरी तरह रोने लगा।ताऊ, ताई, पापा, मां सबने समझाया। मुझे नानी ने गोद में लिया और गले से लगाकर झप्पी देती समझाने लगी।

बाबू जो पेड़ पर चढ़ता है वहीं गिरता है।अगली मैच में जरूर अच्छा करोगे। इस बार भी तीन लोगों को कैसे आउट किया।कैसे बहादुर बेटा हवा में उड़कर कैच पकड़ा।उनकी भाव-भंगिमा देखकर सब हंसने लगे और मैं भी हंसता बिना खायें पिये सो गया।

सच में उसके बाद कभी भी जब भी असफल या नाकामी मिलती है तो नानी की "जादू की झप्पी" की याद आती है।सच में उनके हाथ में जादू था।आज नानी, पिताजी,ताऊ ,ताई सभी का निधन हो चुका है। मैं स्वयं आज बहू बेटे बाला हूं। मगर आज भी जादू की झप्पी मुझे सुकून देती है।

परमा दत्त झा, भोपाल

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