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छुपन-छुपाई: गृहलक्ष्मी की कहानियां

छुपन-छुपाई: गृहलक्ष्मी की कहानियां

Hindi Short Story: कुछ शब्द केवल शब्द न होकर अपने भीतर पूरा एक संसार समेटे होते हैं। ऐसा ही मेरे लिए वो शब्द है—'छुपन-छुपाई'। इस शब्द से आँखों के सामने बचपन की वे गलियाँ उतर आती हैं, याद आती हैं बचपन की सहेलियाँ (जो फिर कभी मिली ही नहीं) नन्हे दोस्त, नानी का घर, मायके की गलियाँ और आस-पड़ोस के वे घर, जहाँ हर बड़े को बुआ, चाची या ताई कहकर बुलाया जाता था।

और इन सबके बीच सबसे ज्यादा याद आती है—माँ की डाँट।

बचपन से ही मुझे पढ़ाई की अपेक्षा खेलों में अधिक आनंद आता था। गर्मी की छुट्टियाँ आते ही हमारे मोहल्ले में जब बच्चे अपनी नानी के घर आते, तो मैं भी उनके साथ खेलने पहुँच जाती। और जब मैं अपनी नानी के घर जाती, वहाँ भी खेल-कूद में ही दिन बीतते। घर हो या नानी का घर, छुट्टियों का आनंद दुगुना ही होता था, क्योंकि दोस्त भी तो दुगुने हो जाते थे। दोपहर में जब घर के सभी लोग सो जाते, मैं चुपचाप जागती रहती क्योंकि सोचती थी सो गई तो शाम का खेल छूट जाएगा।

शाम होते ही शुरू होता हमारा सबसे प्रिय खेल—छुपन-छुपाई। मैं हर बार ऐसी जगह तलाशती, जहाँ कोई मुझे ढूँढ़ न सके। मेरी सबसे पसंदीदा जगह थी—पानी की टंकी के आसपास। मैं बड़े गर्व से सोचती, “आज तो कोई मुझे ढूँढ़ ही नहीं पाएगा।” लेकिन मेरी माँ मुझे ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वहाँ पहुँच जातीं। मुझे देखते ही उनका चेहरा गुस्से से भर जाता और कहतीं, “तू इतनी ऊँची टंकी पर चढ़ जाती है? कहीं गिर गई तो हाथ-पैर टूट जाएँगे!” उस समय माँ की डाँट मुझे बहुत बुरी लगती थी।

मैं मन ही मन सोचती—“सब बच्चे खेल रहे हैं, फिर मुझे ही क्यों रोकती हैं?” कहाँ समझती थी तब कि माँ मुझे खेल से नहीं, खतरे से रोक रही थीं। नहीं समझती थी कि उनकी कठोर आवाज के पीछे एक ऐसा कोमल हृदय था, जो बेटी की छोटी-सी चोट की कल्पना से भी काँप उठता था। समय बीतता गया। माँ की मेहनत से मैंने पढ़-लिखकर डॉक्टर बनने का सपना पूरा किया और अपने क्लीनिक में प्रैक्टिस करने लगी। लेकिन कहते हैं न—बचपन कभी खत्म नहीं होता, बस कहीं भीतर छुपकर बैठ जाता है। आज जब मेरे क्लीनिक में बच्चे कभी-कभी खेलते हुए इधर-उधर छुपते हैं, तो मन करता है मैं भी उनके खेल में शामिल हो जाऊँ।

उनकी शरारतों में अपना बचपन दिखाई देता है। लेकिन जब कोई बच्चा ऊँची जगह पर चढ़ने लगता है, तो मेरा मन अचानक घबरा उठता है। मैं उसे तुरंत रोक देती हूँ। और उसी पल मुझे माँ याद आती हैं। तब लगता है, मैं माँ की बेटी से कब माँ जैसी हो गई, पता ही नहीं चला। आज उनकी डाँट के शब्द याद नहीं, लेकिन उस डाँट में छिपा प्यार पूरी तरह याद है।

आज समझ आता है कि माँ की डाँट में छिपी थी मेरी सलामती की प्रार्थना। छुपन-छुपाई मेरे लिए केवल बचपन का एक खेल नहीं है। यह मेरे जीवन की वह मीठी स्मृति है, जिसमें गलियों की धूल है, दोस्तों की हँसी है, नानी के घर की गर्माहट है, मासूम बचपन है और माँ की डाँट है—डाँट में छिपा है माँ का अनमोल प्यार।

  • डॉ. प्रेरणा गर्ग, दिल्ली

मिट्टी में लौट आया बचपन: गृहलक्ष्मी की कहानियां

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